That night,
When people were dressed in silk
And garlanded with gold,
For somebody was getting married,
And it was a very good reason to unleash floods
Of saved, even borrowed, money,
I too was there.
I was there, yes,
Wearing a shirt I wear once every week:
The one that’s worn out but still looks new;
The one that’s striped, and branded;
It’s the one that looks expensive . . . and even is,
Like the silk everybody else was wearing.
I was there, yes,
Wearing a watch I wear everyday:
The one that belonged to my father once;
The one that’s leather, and Swiss;
It’s the one that looks expensive . . . and even is,
Like the golden garlands everybody else was wearing.
I was there, yes,
And I was one amongst them.
I had, after all, tried so hard to look like that.
And that moment does not matter.
That when I had asked for a glass of water, and,
I had looked straight into the eyes of the waiter.
The waiter who was a young man –
A young man of my own age.
It does not matter,
That the waiter serving glasses of water to me,
Could’ve so easily been me;
And the guy with the worn out branded shirt and Swiss watch,
Could’ve so easily been him.
It did not matter,
For I wanted to feel,
That I belonged there.
That I had dissolved in them.
It did not matter,
For I wanted to forget,
That I did not.
That I could not.
May 27, 2009
May 8, 2009
Nazm: Maqaam-e-Rafaaqat
मक़ाम-ए-रफाक़त
मकाम कौन सा ले आई रफाक़त यारो,
मुझे मुहब्बत भी नही तुमसे,
और नफरत भी नही।
फ़क़त कुछ वक़्त हूँ मैं इस शहर में अब यारो,
मेरा इस शहर से ताल्लुक़ बहुत गहरा तो नही।
किसी क़फ़स में एक उम्र क़ैद रहने पर,
जैसे उड़ते हैं परिंदे वैसे उड़ जाऊंगा मैं,
खुदा की कस्म फिर वापस न शायद आऊंगा मैं।
मुझे मालूम नही आगे क्या ठिकाना होगा,
क्या फ़साना होगा आगे मेरी तन्हाई का।
ये यक़ी हैं मुझको,
तवाइफों के बिस्तरों पर मोहब्बत ढूँढूँगा,
मोहब्बत पाउँगा कभी?
मुझे इसका यक़ी नही।
मैखानो में खुदकुशी की तमन्ना बारहा होगी,
तमन्ने जीने की होगी?
मुझे इसका यक़ी नही।
आज तन्हा हूँ, फ़क़त इसलिए मोहताज हूँ मैं,
गुज़रे कुछ दौर ग़लत, इसलिए बर्बाद हूँ मैं।
तरस न खाओ मुझपे, और न रहम खाओ,
आईना देखो और अपनी खुदपरस्ती पे शरम खाओ।
बहार छोड़ जाएगी एक दिन तुम्हारे भी गुलशन,
जलाओगे तुम चिराग और नही होंगे दर रौशन।
किसी शहँशाह के महल पे कभी वक़्त के ज़ख्म देखो,
जो कुछ खज़ानो में था वो ही ख़राबो में दिखाई देता हैं,
वक़्त की तासीर पता चल जाएगी तुम्हे उस दिन वह मंज़र देख के शायद।
उस दिन दोज़ख की आग में जलते हुए भी मैं,
खुदा बख्शे,
तुम्हारी ज़िन्दगी के ख़राबो पर कहकहे लगाऊंगा,
जिस तरह मेरी हयात के ग़मो से आज गुरेज़ा हो तुम,
ये जान कर भी के कुछ हवादिस तुम्हारी ही अमानते हैं।
कोई परवाह नही,
मुहब्बत भी नही,
नफरत भी नही।
मेरा दिल दिल नही अब संग हो गया यारो,
रगों में बहता खून बर्फ़ हो गया यारो,
मकाम कौन सा ले आई रफाक़त यारो।
मुझे मुहब्बत भी नही तुमसे,
और नफरत भी नही।
[The comments have been disabled for this one. Do not bother. And the meanings of somewhat-difficult Urdu words have been avoided purposefully too.]
मकाम कौन सा ले आई रफाक़त यारो,
मुझे मुहब्बत भी नही तुमसे,
और नफरत भी नही।
फ़क़त कुछ वक़्त हूँ मैं इस शहर में अब यारो,
मेरा इस शहर से ताल्लुक़ बहुत गहरा तो नही।
किसी क़फ़स में एक उम्र क़ैद रहने पर,
जैसे उड़ते हैं परिंदे वैसे उड़ जाऊंगा मैं,
खुदा की कस्म फिर वापस न शायद आऊंगा मैं।
मुझे मालूम नही आगे क्या ठिकाना होगा,
क्या फ़साना होगा आगे मेरी तन्हाई का।
ये यक़ी हैं मुझको,
तवाइफों के बिस्तरों पर मोहब्बत ढूँढूँगा,
मोहब्बत पाउँगा कभी?
मुझे इसका यक़ी नही।
मैखानो में खुदकुशी की तमन्ना बारहा होगी,
तमन्ने जीने की होगी?
मुझे इसका यक़ी नही।
आज तन्हा हूँ, फ़क़त इसलिए मोहताज हूँ मैं,
गुज़रे कुछ दौर ग़लत, इसलिए बर्बाद हूँ मैं।
तरस न खाओ मुझपे, और न रहम खाओ,
आईना देखो और अपनी खुदपरस्ती पे शरम खाओ।
बहार छोड़ जाएगी एक दिन तुम्हारे भी गुलशन,
जलाओगे तुम चिराग और नही होंगे दर रौशन।
किसी शहँशाह के महल पे कभी वक़्त के ज़ख्म देखो,
जो कुछ खज़ानो में था वो ही ख़राबो में दिखाई देता हैं,
वक़्त की तासीर पता चल जाएगी तुम्हे उस दिन वह मंज़र देख के शायद।
उस दिन दोज़ख की आग में जलते हुए भी मैं,
खुदा बख्शे,
तुम्हारी ज़िन्दगी के ख़राबो पर कहकहे लगाऊंगा,
जिस तरह मेरी हयात के ग़मो से आज गुरेज़ा हो तुम,
ये जान कर भी के कुछ हवादिस तुम्हारी ही अमानते हैं।
कोई परवाह नही,
मुहब्बत भी नही,
नफरत भी नही।
मेरा दिल दिल नही अब संग हो गया यारो,
रगों में बहता खून बर्फ़ हो गया यारो,
मकाम कौन सा ले आई रफाक़त यारो।
मुझे मुहब्बत भी नही तुमसे,
और नफरत भी नही।
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